जयपुर। नीरजा मोदी स्कूल में हुई दुर्भाग्यपूर्ण दुर्घटना ने पूरे प्रदेश को शोक में डुबो दिया है। बच्चों की असमय मृत्यु से समाज में स्वाभाविक रूप से पीड़ा और आक्रोश व्याप्त है। इसी क्रम में प्रशासन द्वारा नीरजा मोदी स्कूल की मान्यता रद्द किए जाने का निर्णय लिया गया, जिस पर अब विभिन्न स्तरों पर सवाल उठने लगे हैं।
शिक्षा जगत से जुड़े लोगों का कहना है कि यह निर्णय भावनात्मक दबाव में लिया गया प्रतीत होता है, जिसका सीधा प्रभाव उन हजारों विद्यार्थियों पर पड़ा है, जिनका इस दुर्घटना से कोई संबंध नहीं है। मान्यता रद्द होने से छात्रों का शैक्षणिक भविष्य अनिश्चितता में चला गया है।
विशेषज्ञों का मत है कि संविधान और कानून दुर्घटना तथा आपराधिक लापरवाही के बीच स्पष्ट अंतर करते हैं। प्रत्येक दुर्घटना को अपराध मानकर कठोरतम दंड देना न्यायिक प्रक्रिया का उद्देश्य नहीं हो सकता। यदि किसी एक घटना के बाद दबाव में इस तरह के निर्णय लिए जाएंगे, तो नियमों की समानता और पारदर्शिता पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है।
इसी संदर्भ में झालावाड़ में हुए उस हादसे की भी चर्चा की जा रही है, जहाँ एक सरकारी विद्यालय की छत गिरने से सात विद्यार्थियों की मौत हो गई थी। उस मामले में न तो विद्यालय की मान्यता पर कोई कार्रवाई हुई और न ही जिम्मेदारों पर त्वरित कठोर दंड लगाया गया। ऐसे में यह सवाल उठ रहा है कि क्या नियम सभी संस्थानों पर समान रूप से लागू हो रहे हैं।
शिक्षाविदों और अभिभावकों का मानना है कि किसी भी दुर्घटना की निष्पक्ष जांच कर जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए, लेकिन दंड ऐसा हो जिससे निर्दोष विद्यार्थियों का भविष्य प्रभावित न हो।
इस पूरे मामले में Central Board of Secondary Education जैसे राष्ट्रीय शैक्षणिक निकाय से अपेक्षा की जा रही है कि वह भावनाओं से ऊपर उठकर समान मापदंडों के आधार पर निर्णय ले। सुधारात्मक कदम, सुरक्षा मानकों की सख्ती और जवाबदेही तय करना आवश्यक है, ताकि भविष्य में इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो।
शिक्षा क्षेत्र से जुड़े लोगों का कहना है कि न्याय वही है जो समान हो। त्वरित और प्रतीकात्मक कठोरता से व्यवस्था में सुधार नहीं आता, बल्कि संतुलित और विवेकपूर्ण निर्णय ही स्थायी समाधान का मार्ग प्रशस्त करते हैं।
संवाददाता -अकरम खान पाली










