पाली। धापू बाई कॉलेज के बीएसटीसी विद्यार्थियों का सब्र आखिरकार टूट गया। कॉलेज प्रबंधन की कथित मनमानी, जबरन वसूली और मानसिक उत्पीड़न के आरोपों को लेकर विधार्थियों ने पैदल रैली निकाली और जिला कलेक्टर कार्यालय पाली के बाहर जोरदार प्रदर्शन किया।
नारेबाजी के बीच छात्रों का ऐलान साफ था
इस कालेज की मान्यता निरस्त हो
“पेड़ के नीचे बैठकर पढ़ लेंगे, लेकिन इस कॉलेज में नहीं!”
छात्रों के गंभीर आरोप: शिक्षा या दबाव❓
प्रदर्शनकारी विद्यार्थियों ने प्रशासन के सामने जो तस्वीर रखी, वह चिंताजनक है
कॉलेज बस या हॉस्टल जबरन लेने का दबाव।
जो विद्यार्थी बस/हॉस्टल नहीं लेते, उन्हें मानसिक रूप से परेशान किया जाता है।
जिससे भय का माहौल।
पढ़ाई पर फोकस खत्म, करियर खतरे में।
विद्याथिर्यों ने कॉलेज डायरेक्टर और उनकी पत्नी पर हठधर्मिता मनमानी, शोषण और मानसिक उत्पीड़न के गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि यह सिर्फ अनुशासन का सवाल नहीं, अधिकारों के दमन का मामला है।
बढ़ते आक्रोश को देखते हुए विमलेंद्र सिंह राणावत तत्काल सक्रिय हुए।
तहसीलदार के साथ मौके पर पहुंचकर उपस्थिति रजिस्टर सीज किया गया और निष्पक्ष जांच के स्पष्ट संकेत दिए गए।
प्रशासन का यह कदम छात्रों के भरोसे की पहली ईंट माना जा रहा है।
कॉलेज प्रबंधन का पक्ष
कॉलेज डायरेक्टर ने सभी आरोपों को निराधार बताया।
उनका कहना है कुछ छात्र राजनीति कर रहे हैं और कॉलेज संपत्ति को नुकसान पहुंचा रहे हैं।
कई छात्र बिना सूचना 15–15 दिन अनुपस्थित रहते हैं, इसलिए अनुशासनात्मक कार्रवाई जरूरी है।
असल सवाल: अनुशासन बनाम अधिकार
यह मामला केवल एक कॉलेज तक सीमित नहीं।
यह उस रेखा का प्रश्न है जहां अनुशासन के नाम पर शोषण शुरू हो जाता है।
शिक्षा संस्थान भय का कारखाना नहीं, भविष्य गढ़ने की प्रयोगशाला होते हैं।
“कलम की जगह डर पकड़ा दो, तो कक्षा कब तक चलेगी❓
हक़ छिन जाएँ जहाँ, वहाँ शिक्षा कैसे फलेगी❓”
आगे क्या❓
फिलहाल जांच जारी है।
रिपोर्ट के बाद ही कार्रवाई तय होगी।
लेकिन इतना तय है यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो कठोर और उदाहरणात्मक कदम उठने चाहिए, और यदि नहीं, तो छात्रों के विश्वास की मरम्मत भी उतनी ही ज़रूरी है।
“इंसाफ़ देर से आए तो भी चले,
मगर बराबरी से आए यही क़ानून का हक़ है।”
उम्मीद है कि प्रशासन पारदर्शिता के साथ सच्चाई सामने लाएगा और शिक्षा के मंदिरों में भय नहीं, भरोसा लौटेगा।
*अकरम खान पाली*










