राजस्थान। हाल ही में राजस्थान के शिक्षा मंत्री श्री मदन दिलावर जी ने कोटा के सार्वजनिक मंच से एक बड़ा ऐलान किया
“सरकारी और गैर-सरकारी विद्यालयों में स्कूल ड्रेस एक जैसी होगी।”
यानी पूरा प्रदेश एक ही रंग, एक ही पोशाक, एक ही पहचान में ढल जाएगा।
यह फैसला सिर्फ कपड़ों का नहीं,
सोच, पहचान, वर्ग और व्यवस्था से जुड़ा हुआ फैसला है।
और जब बात सोच की हो तो बहस, भावना और क्रांति तीनों अनिवार्य हो जाते हैं।
“रूतबा न दौलत से, न ऊँचे महलों से होता है,
बच्चा तभी बड़ा बनता है जब मन में भरोसा होता है।”
दुनिया के हर बड़े सिस्टम में यूनिफॉर्म एक संदेश देती है
“वर्दी बदन पर आए तो सीना खुद फैल जाता है,
फर्ज़ की धड़कन दिल में एक नई लौ जलाती है।”
“एकरूपता” कहीं “एकरंगी सोच” तो नहीं ❓
यूनिफॉर्म समान हो ठीक लेकिन कहीं यह विविधता, रचनात्मकता और स्वतंत्रता को कुचलने वाला कदम न बन जाए।
बच्चे फूल हैं सबको एक रंग में रंग दोगे तो बगीचा कब तक खूबसूरत रहेगा ❓
“सोच पर पहरा हो जाए तो समाज बंधन बन जाता है,
जहाँ सवालों की आग बुझे, वहाँ भविष्य मंद हो जाता है।”
तो क्या स्कूल की वर्दी पहनकर हर बच्चा ज्ञान, नैतिकता और संवेदनशील नागरिक बनने का प्रण लेगा ❓
अगर हां तो ये फैसला ऐतिहासिक है।
अगर नहीं तो ये सिर्फ कपड़ों का परिवर्तन है,
व्यवस्था का नहीं।
समान वर्दी तभी सार्थक है
जब समान अवसर, समान शिक्षा, समान सम्मान भी दिया जाए। राज्य सरकार द्वारा सरकारी बहुत सी योजनाओं का लाभ गैर सरकारी में अध्ययनरत बालकों को नहीं दिया जाता है , जब समान वर्दी तो समान लाभ भी मिलना चाहिए
वरना “कपड़े बदल देने से इंसाफ नहीं बदलता,
क्रांति तब होती है जब सोच भीतर से हिलती है।”
अगर सरकार इस फैसले के साथ
शिक्षा की गुणवत्ता, शिक्षकों की कमी, सरकारी स्कूलों की बदहाल स्थिति, और निजी स्कूलों की मनमानी पर लगाम कसने का साहस दिखाए तब ये कदम बदलाव नहीं, बगावत की नींव साबित होगा।
क्योंकि इतिहास गवाह है
यूनिफॉर्म सैनिकों ने नहीं,
सोच की यूनिफॉर्म ने क्रांति रची है।
अब वक्त है वर्दी में बच्चों को ढालने का नहीं, उनके भविष्य को दिशा देने का।
अकरम खान पाली।










