पाली । ✍️ न्यूज़ रिपोर्टर- अकरम खान, पाली।
पाली की सर जमीन अपनी सांस्कृतिक विविधता और धार्मिक आस्थाओं के लिए जानी जाती है। यहाँ दीपावली के कुछ ही दिनों बाद छठ पूजा का पर्व पूरे श्रद्धा, विश्वास और भक्ति के साथ मनाया जाता है।
भले ही यह पर्व बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश की परंपरा से जुड़ा रहा है, लेकिन अब राजस्थान के शहरों और गाँवों में भी इसकी झलक पूरे उत्साह के साथ देखने को मिलती है।
जयपुर, पाली, जोधपुर, कोटा, बीकानेर और उदयपुर जैसे शहरों में नदियों, तालाबों और कृत्रिम घाटों पर श्रद्धालु महिलाएँ निर्जला उपवास रखकर डूबते और उगते सूर्य को अर्घ्य देती हैं। यह पर्व सूर्य भगवान और माता षष्ठी (छठी मइया) की पूजा का प्रतीक है, जो परिवार की सुख-समृद्धि और संतान की दीर्घायु के लिए किया जाता है। राजस्थान में भले ही यहाँ की नदियाँ गंगा जैसी विशाल न हों, परन्तु यहाँ के तालाब और सरोवर श्रद्धा के सागर में परिवर्तित हो जाते है। राजस्थान की रेत पे भी भक्ति का सागर बहता है,
हर हृदय कहता — “जय छठी मइया” बस यही रहमत है।
राजस्थान की जनसंख्या में बिहार और झारखंड से आए प्रवासी लोगों की अच्छी संख्या है, जिनके कारण अब यहाँ छठ पूजा एक लोक उत्सव का रूप ले चुकी है। नगर निगम और स्थानीय प्रशासन घाटों पर विशेष व्यवस्था करते हैं। लोग “छठ मइया” के गीत गाते हुए घाटों तक पहुँचते हैं —
“कांचा ही बांस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाए…” ऐसे लोकगीत राजस्थान की गलियों में भी अब गूंजने लगे हैं।
छठ पूजा केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि यह भारतीय संस्कृति में स्त्री की शक्ति, त्याग और निष्ठा का प्रतीक है।
राजस्थान की सर जमीन पर जब सूर्य को अर्घ्य देते हुए गीत गूंजते हैं, तब यह साबित हो जाता है कि श्रद्धा की कोई सीमा नहीं होती — चाहे वह गंगा तट हो या पाली का लूणी किनारा। छठ पूजा अब राजस्थान की सांस्कृतिक धरोहर का हिस्सा बन चुकी है।










