किसी ग्रह विशेष का रत्न किस अंगुली में धारण करें

👇समाचार सुनने के लिए यहां क्लिक करें

किसी_ग्रह_विशेष_का_रत्न_किस_अंगुली_में_धारण_करें :-

. आमतौर पर कोई भी रत्न अंगूठी के रूप में हाथ की चार उंगलियों में हथेली पर उनके ग्रहों के पर्वत के अनुसार धारण किया जाता है ! कुल 9 ग्रहों के लिए 9 रत्नों की 9 अंगूठियां हो सकती हैं ! लेकिन इन्हे धारण करने में समस्या इसलिए नहीं होती है क्योंकि मारक और विपरीत ग्रहों के रत्नो की अंगूठी एक साथ पहनने की सलाह नहीं दी जाती है ! कुछ विशेष परिस्थितियों को छोड़कर प्रायः कोई भी व्यक्ति राहु-केतु के रत्न धारण नहीं करता है !

. शेष सात ग्रहों में से भी विपरीत प्रभाव रखने वाले तथा कुण्डली में मारक ग्रह का भी रत्न धारण नहीं किया जा सकता है !

शौकिया तौर पर रत्न कभी नहीं धारण करना चाहिए, क्योंकि ऐसा करना लाभ के स्थान पर नुकसान दायक भी हो सकता है !

कुण्डली के लग्न के अनुसार रत्न योग कारक ग्रहों के लिए धारण करना चाहिए, विशेष तौर पर उनके कमजोर होने, पीड़ित होने पर उन योग कारक ग्रहों का रत्न धारण करना चाहिए ! इस प्रकार से देखा जाय तो किसी भी कुण्डली के योग कारक ग्रहों से सम्बन्धित मात्र दो या तीन रत्न की अंगूठी ही किसी को पहनना पड़ सकता है !

किसी भी दशा मे चार से अथिक अंगुठी एक समय में एक साथ धारण नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे विपरीत प्रभाव पड़ सकता है !

पुखराज तर्जनी में ही क्यों पहनने की सलाह देते हैं, क्योंकि कोई भी व्यक्ति धमकी, निर्देश आदि देता है तो इसी उंगली से देता है ! यही उंगली लड़ाई का भी कारण बनती है, तो होशियार करने के लिए भी काम आती है ! इसलिए गुरु का रत्न पुखराज पहनने की सलाह दी जाती है ! पुखराज पहनने से उस जातक में गंभीरता आती है ! साथ ही वह अन्याय के प्रति सजग हो जाता है ! यह धर्म-कर्म में भी आस्था जगाता है ! गुरु का प्रभाव बढ़ाने और उसके अशुभ प्रभाव को खत्म करने के लिए पुखराज पहना जाता है !

अधिकांश व्यक्ति पुखराज पहनते हैं ! इनमें प्रमुख राजनेता, प्रशासनिक अधिकारी, न्यायाधीश, मंत्री, राजनायक, अभिनेता आदि की उंगली में देखा जा सकता है ! पुखराज के साथ माणिक पहना जाए तो अति शुभ फल भी मिल सकते हैं ! मध्यमा में नीलम धारण करते है व इसके अलावा कोई भी रत्न नहीं पहनना चाहिए अन्यथा शुभ परिणाम नहीं मिलते ! इस उंगली पर ही आकर भाग्य रेखा खत्म होती है जिनकी भाग्य रेखा न हो वे किसी जानकार से सलाह लेकर नीलम पहन कर लाभ पा सकते हैं !

नीलम शनि के शुभ फल देने में सहायक होता है, यह अक्सर लोहे के व्यवसायी, प्रशासनिक व्यक्ति, राजनेता भी पहने देखे जा सकते हैं ! इसके बारे में यह कहावत है कि यह रत्न तुरन्त फलदायी होता है व इसका शुभ या अशुभ परिणाम शीध्र देने में सक्षम हैं ! यह रत्न बगैर किसी जानकार की सलाह के नहीं पहनना चाहिए !

माणिक अनामिका में पहना जाता है, यह सूर्य का रत्न है ! बर्मा का माणिक अधिक महंगा होता है, वैसे आजकल कई नकली माणिक भी बर्मा का कहकर बेच देते हैं ! बर्मा का माणिक अनार के दाने के समान होता है ! इसके पहनने से प्रशासनिक, प्रभाव में वृद्धि व शत्रुओं को परास्त करने में भी सक्षम है ! इसे भी नेता राजनीति से संबंध रखने वाले, उच्च पदाधिकारी, न्यायाधीश, कलेक्टर आदि की उंगली में देखा जा सकता हैं !

कनिष्ठिका उंगली में पन्ना पहना जाता है ! यह बौधिक गुणों को बढ़ाता है, जिसे बिजनेसमैन ज्यादा पहनते हैं ! इसको पहनने से पत्रकारिता, सेल्समैन, प्रकाशन, दिमागी कार्य करने वाले, कलाकार, वाकपटु व्यक्ति भी पहनते हैं !

हीरा, मोती, मूँगा, गोमेद व लहसुनियां :

मूंगा मंगल ग्रह कारत्न है ! यह ऊर्जा बढ़ाने वाला, साहस व महत्वाकांक्षा में वृद्धि व शत्रुओं पर प्रभाव डालने वाला होता है ! मंगल के मित्र गुरु व सूर्य हैं ! यह मकर राशि में उच्च का होता है जिससे मूंगा मध्यमा, तर्जनी व अनामिका में धारण किया जाता है ! इसको अक्सर राजनीतिज्ञ, पुलिस प्रशासन से जुडे व्यक्ति व उच्च पदाधिकारी, भूमि से संबंधित व्यक्तिगण, बिल्डर, कॉलोनाइजर आदि द्वारा पहना हुआ देखा जा सकता है ! इसे माणिक, पुखराज के साथ भी धारण कर सकते हैं ! जिन्हें गुस्सा अधिक आता हो वे इस रत्न को ना पहने ! मूंगे को मोती के साथ भी या संयुक्त रत्न की अंगूठी पहनी जा सकती है !

कनिष्ठिका उंगली में मोती पहनना शुभ फलदायी रहता है, क्योंकि कनिष्ठिका उंगली के ठीक नीचे चन्द्र पर्वत है ! इस कारण चन्द्र के अशुभ परिणाम व शुभत्व के लिए शुभ रहता है ! उसे अनामिका में नहीं पहनना चाहिए ! गुरु की उंगली तर्जनी में भी पहन सकते हैं ! यह रत्न मन को अशान्ति से बचाता है व जिन्हें ज्यादा गुस्सा आता हो, जो जल कार्य से जुड़े व्यक्ति, दूध व्यवसायी, सफेद वस्तुओं के व्यवसाय से जुडे़ व्यक्ति भी पहन सकते हैं ! इसे पुखराज के साथ व माणिक के साथ भी पहना जा सकता है !

हीरा रत्न अत्यन्त महंगा व दिखने में सुन्दर होता है ! इसे गुरु की उंगली तर्जनी में पहनते हैं, क्योंकि तर्जनी उंगली के ठीक नीचे शुक्र पर्वत होता है ! शुक्र के अशुभ प्रभाव को नष्ट कर शुभ फल हेतु हीरा पहनते हैं ! इसे कलाकार, सौंदर्य प्रसाधन से जुडे़ व्यक्ति, प्रेमी, इंजीनियर, चिकित्सक, कलात्मक वस्तुओं के विक्रेता आदि पहन सकते हैं !

राहु का रत्न गोमेद कनिष्ठिका अंगुली में पहनना चाहिए क्योंकि मिथुन राशि में उच्च का होने से बुध की उंगली कनिष्ठिका में पहनना शुभ फलदायी रहता है ! इसे राजनीति, जासूसी, जुआ-सट्टा, तंत्र-मंत्र से जुडे़ व्यक्ति आदि पहनते हैं ! यह राहु के अशुभ प्रभाव को दूर करता है !

लहसुनियां रत्न तर्जनी में पहनना चाहिए क्योंकि गुरु की राशि धनु में उच्च का होता है ! यह ऊंचाइयां प्रदान करता है व शत्रुहन्ता होता है ! इस रत्न को हीरे के साथ कभी भी नहीं पहनना चाहिए, क्योंकि इससे बार-बार दुर्घटना के योग बनता रहेगा !

विभिन्न ग्रहों के उपरत्न :— (Substitute Gems For Planets)
सूर्य – रक्ताश्म, लाल रक्तमणि, स्टार रुबी !
चन्द्र – मून स्टोन !
मंगल – रात-रतुवा (कार्नेलियन) !
बुध – जेड( हरिताश्म), फिरोजा !
गुरु – सुनहला !
शुक्र – ओपल, जर्कन !
शनि – नीली, कटैला (एमेथिस्ट) !
राहु – अम्बर, तुरसावा !
केतु – मार्का, एलेग्जण्ड्राइट !

ग्रहों से संबंधित धातुएँ [ Metals for Planets ]

सूर्य – सोना ! चन्द्र – चाँदी !
मंगल – ताँबा, सोना ! बुध – कांसा !
गुरु – सोना ! शुक्र – चाँदी !
शनि – लोहा एवं अष्टधातु !
राहु – अष्टधातु , सीसा !
केतु – अष्टधातु , सीसा !

ग्रह रत्न  उंगली धारण का दिन
सूर्य माणिक्य अनामिका रविवार
चन्द्र मोती कनिष्ठिका सोमवार
मंगल मूँगा मध्यमा,अनामिका मंगलवार
बुद्ध पन्ना कनिष्ठिका बुद्धवार
गुरू पुखराज तर्जनी गुरुवार
शुक्र हीरा,ओपल तर्जनी शुक्रवार
शनि नीलम मध्यमा शनिवार
राहु गोमेद कनिष्ठिका बुद्धवार
केतु लहसुनिया तर्जनी गुरुवार

1 – सूर्य को मजबूत करने के लिए माणिक्य पहना जाता है !
2 – चन्द्रमा को बल देने के लिए मोती पहनते हैं !
3 – मंगल को बल देने केलिए मूँगा रत्न पहना जाता है !
4 – बुध कुण्डली में शुभ फल नहीं दे रहे हैं तब पन्ना धारण करना चाहिए ! 5 – गुरु को बली बनाने के लिए आप पुखराज पहन सकते हैं !
6 – शुक्र के कमजोर होने से परेशानी है तब हीरा पहन सकते हैं !
7 – शनि को मजबूत बनाने के लिए नीलम पहनना चाहिए !
8 – राहु के कारण बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है तब गोमेद पहना जाता है !
9 – केतु से पीड़ित हैं, तब लहसुनिया धारण करना चाहिए !

कई बार व्यक्ति महंगे रत्न खरीदने में असमर्थ होता है तब उनके स्थान पर उपरत्न पहनने की सलाह दी जाती है ! प्राचीन ग्रन्थों में 84 प्रकार के उपरत्नों का जिक्र किया गया है ! कई उपरत्नों का अपना स्वतंत्र महत्व भी होता है !

व्यक्ति की आवश्यकता अनुसार उपरत्नों को धारण करने का परामर्श दिया जाता है ! कई बार स्वास्थ्य संबंधी बातों में रत्नों के बजाय उपरत्न बहुत ही सफलता से काम करते हैं क्योंकि वह केवल एक ही विषय से संबंधित होते हैं ! कई बार संबंधित ग्रह की धातुओं को धारण करने मात्र से भी लाभ मिल जाता है !

इन धातुओं का दान करने से भी ग्रह को बल मिलता है !

रत्नों को धारण करने से पूर्व सावधानियाँ :—

कोई भी रत्न अथवा उपरत्न धारण करने से पूर्व उसकी जाँच आपको अवश्य करनी चाहिए कि यह आपके लिए अनुकूल होगा या प्रतिकूल होगा ! आप किसी भी रत्न को धारण करने से पूर्व उसे दो से सात दिन तक अपने पास रखें ! आप इसे अपने पर्स में अपने साथ रख सकते हैं या रात में सोते समय अपने बिस्तर में तकिए के नीचे रख सकते हैं ! यदि इन दिनों में कुछ गलत अनुभव नहीं होता है, कुछ सुकून महसूस करते हैं और रात में चैन की नींद आती है तब उस रत्न या उपरत्न को विधिपूर्वक मंत्रोपचारित कर धारण कर सकते हैं !

रत्नों को धारण करने से पहले यह देख लें कि उनका कोई किनारा टूटा हुआ तो नहीं है ! कोई खरोच या लकीर बुलबुला जैसी अाकृति तो नहीं है ! कई बार इनमें बहुत ही महीन दरार होते हैं, जो इन्हें तराशते समय पड़ जाते हैं ! ऎसे रत्न आपको कतई धारण नहीं करने चाहिए ! यदि कोई पहना हुआ रत्न देता है तब उसे बिलकुल भी धारण नहीं करना चाहिए ! रत्न व्यक्ति की नकारात्मक बातों को अपने अंदर समा लेता है ! इसलिए यदि किसी का उतारा हुआ रत्न धारण करेगें तब अशुभ फलों का सामना करना पड़ सकता है !

रत्नों अथवा उपरत्नों को ज्योतिषीय सलाह के बाद ही धारण करना चाहिए अर्थात ज्योतिषी द्वारा एक विशेष समय रत्न धारण करने को बताया जाता है ! उस समय में इस रत्न को बताई विधि अनुसार धारण करें ! एक बात का ध्यान हमेशा रखें कि जब भी कोई रत्न या उपरत्न धारण करें उसे शुक्ल पक्ष में धारण करें कृष्ण पक्ष में कोई भी रत्न धारण न करें ! शुक्ल पक्ष में भी पंचमी तिथि पर या उसके बाद चतुर्दशी तक ही धारण करें ! रत्न को कम से कम छः घण्टे गाय के ताजा दूध में डाल कर साफ निरापद स्थान पर रख दें, पहनने से पूर्व दूध से रत्न निकाल कर पंचामृत ( गाय के ताजा दूध, दही, घृत, शहद, शर्करा व गंगाजल के मिश्रण ) से स्नान कराएँ और उस रत्न से संबंधित ग्रह या ग्रह के आराध्य देव का मंत्र कम से कम 108 बार जाप करके शुभ समय पर हवन आहुति या धूप आरती के पश्चात ही इसे धारण करें !

Vartmaan Times
Author: Vartmaan Times

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

और पढ़ें