
जोधपुर। जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय के मुख्य परिसर में सोमवार को शिक्षा व्यवस्था की संवेदनशीलता पर गंभीर सवाल खड़े करने वाला दृश्य सामने आया। जोधपुर संभाग के समस्त निजी महाविद्यालयों के डायरेक्टर, अध्यक्ष, सचिव एवं प्रतिनिधि मंडल विद्यार्थियों से जुड़ी गंभीर समस्याओं को लेकर विश्वविद्यालय पहुंचे, लेकिन कुलपति कार्यालय के बाहर उन्हें दो से तीन घंटे तक सड़क पर बैठकर इंतज़ार करना पड़ा।
प्रतिनिधि मंडल में जोधपुर, पाली, जालौर, बाड़मेर सहित संभाग के दूरदराज़ क्षेत्रों से आए कॉलेज संचालक शामिल थे। ये वे लोग हैं जो केवल कुछ विद्यार्थियों नहीं, बल्कि लाखों विद्यार्थियों के शैक्षणिक भविष्य से प्रत्यक्ष रूप से जुड़े हुए हैं। इसके बावजूद विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा उनसे संवाद नहीं किया जाना शिक्षा जगत में गहरी नाराजगी का कारण बन गया।
कॉलेज प्रतिनिधियों ने बताया कि यह प्रतीक्षा कुछ मिनटों की नहीं, बल्कि लगातार कई घंटों तक कुलपति कार्यालय के बाहर सड़क पर बैठाकर कराई गई। आश्चर्य की बात यह रही कि विश्वविद्यालय परिसर में स्थित विशाल बृहस्पति भवन उपलब्ध होने के बावजूद प्रतिनिधि मंडल को वहां बैठने की अनुमति नहीं दी गई। इसे लेकर कॉलेज संचालकों ने विश्वविद्यालय प्रशासन की कार्यशैली और संवेदनशीलता पर गंभीर सवाल उठाए।
कॉलेज संचालकों का कहना है कि कुलपति पद को भले ही ‘कुलगुरु’ की संज्ञा दी गई हो, लेकिन व्यवहार में संवाद, समन्वय और संवेदनशीलता का पूर्ण अभाव नजर आया। उनका आरोप है कि इस रवैये से यह संदेश देने का प्रयास किया गया कि उनकी मांगों और विद्यार्थियों की समस्याओं पर किसी प्रकार का विचार नहीं किया जाएगा।
परीक्षा शुल्क वृद्धि से विद्यार्थियों में भारी आक्रोश-
विश्वविद्यालय द्वारा परीक्षा शुल्क में की गई भारी बढ़ोतरी को लेकर विद्यार्थियों एवं अभिभावकों में तीव्र आक्रोश व्याप्त है। जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय से संबद्ध महाविद्यालयों के प्रथम वर्ष के विद्यार्थियों से ₹3100 परीक्षा शुल्क लिया जा रहा है, जबकि अन्य विश्वविद्यालयों में यही शुल्क मात्र ₹1300 है। समान शैक्षणिक व्यवस्था में इस प्रकार का बड़ा अंतर विद्यार्थियों के साथ अन्याय बताया जा रहा है।
इसके साथ ही परीक्षा फॉर्म भरने के लिए अत्यंत सीमित समय-सीमा निर्धारित की गई है। विद्यार्थियों और कॉलेज प्रबंधन का कहना है कि कुछ ही दिनों में पूरी प्रक्रिया पूरी करना व्यावहारिक नहीं है, जिससे तकनीकी समस्याएं बढ़ रही हैं और आर्थिक दबाव भी विद्यार्थियों पर पड़ रहा है।
कॉलेज प्रतिनिधियों ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि जब कॉलेज संचालक ही विद्यार्थियों की समस्याओं को लेकर विश्वविद्यालय प्रशासन से मुलाकात नहीं कर पा रहे हैं, तो दूरदराज़ क्षेत्रों से आने वाले सामान्य विद्यार्थियों की सुनवाई कैसे होगी—यह एक गंभीर और चिंताजनक प्रश्न है।
राज्य सरकार से हस्तक्षेप की मांग-
इस पूरे घटनाक्रम को लेकर निजी महाविद्यालयों के प्रतिनिधियों, शिक्षाविदों एवं विद्यार्थी संगठनों ने राज्य सरकार और उच्च शिक्षा विभाग से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। उन्होंने विश्वविद्यालय प्रशासन की जवाबदेही तय करने, परीक्षा शुल्क वृद्धि पर पुनर्विचार करने तथा विद्यार्थियों को शीघ्र राहत देने की आवश्यकता पर जोर दिया है।










