राजस्थान सरकार एवं शिक्षा विभाग द्वारा आगामी सत्र 2026–27 के लिए नवीन सत्र 1 अप्रैल से प्रारंभ करने का आदेश जारी किया गया है।
यह निर्णय जितना प्रशासनिक दृष्टि से सुव्यवस्थित दिखता है, उतना ही विद्यार्थियों, अभिभावकों तथा शिक्षकों के लिए चिंता और असमंजस भी खड़ा करता है। वार्षिक परीक्षाएं समाप्त होते ही एक अभिभावक स्वाभाविक रूप से अपने बच्चों के लिए नए पाठ्यक्रम की किताबें खरीदने की तैयारी कर लेंगे पर क्या यह निर्णय सही समय पर लिया गया है❓
“फ़ैसले जब भी हों, सोच कर हों तो बेहतर,
वरना एक कदम से ही सफ़र मुश्किल हो जाता है…”
1 अप्रैल से 15 मई तक स्कूल क्या बच्चे वास्तव में पढ़ पाएंगे❓
गर्मी के बढ़ते तापमान के बीच 1 अप्रैल से 15 मई तक कक्षाएं आयोजित करना शिक्षा विभाग की मजबूरी तो हो सकती है, परंतु व्यवहारिक रूप से यह बच्चों के हित में कितना लाभकारी रहेगा, यह बड़ा सवाल है। कक्षा 1 से 8 तक के नाजुक आयु वर्ग के विद्यार्थी इतने गर्म मौसम में स्कूल तो आ जाएंगे, पर क्या उनकी वास्तविक सीख, अनुशासन और अध्ययन क्षमता बनी रह सकेगी❓
इसके बाद 15 मई से लगभग डेढ़ माह का ग्रीष्मकालीन अवकाश, और फिर जुलाई में स्कूल का पुनः प्रारंभ यह शैक्षणिक प्रवाह को तोड़ देता है। अधिकारियों का मानना है कि सत्र जल्दी शुरू होगा तो पाठ्यक्रम पूरा करने में आसानी होगी, परंतु वास्तविकता यह है कि अप्रैल–मई की गर्मी में बच्चे पढ़ नहीं पाते। फिर डेढ़ महीने की छुट्टियों में सीखा हुआ अधिकांश भूल जाते हैं। जुलाई में फिर से बच्चों को “रनिंग में लाने” के लिए पूरा महीना लग जाता है।
“बच्चों की क़ाबिलियत को वक़्त चाहिए साहब,
जल्दबाज़ी में खोया हुआ कल वापस नहीं आता…”
अप्रैल / मई में अत्यधिक गर्मी बच्चों के स्वास्थ्य और सीखने की क्षमता को कम करती है। एक महीने पढ़ाई → डेढ़ महीने अवकाश → फिर जुलाई में नया सत्र जैसा भ्रम पैदा होगा। अभिभावकों पर आर्थिक व मानसिक दबाव किताबें तुरंत खरीदनी होंगी, जबकि परिणाम अभी ताज़ा ही होंगे। शिक्षा की निरंतरता टूटेगी और बच्चों का शैक्षणिक रफ़्तार कमजोर होगी। शिक्षक भी अध्यापन की सही योजना नहीं बना पाएंगे।
निर्णय पर पुनर्विचार की आवश्यकता-
विद्यार्थियों की मनोवैज्ञानिक, शारीरिक और शैक्षणिक आवश्यकताओं को देखते हुए 1 अप्रैल से सत्र प्रारंभ करना व्यवहारिक रूप से लाभ से अधिक हानि पहुंचा सकता है। बेहतर होगा कि शिक्षा विभाग इस निर्णय पर पुनर्विचार करे या फिर ऐसा लचीला मॉडल तैयार करे, जिसमें बच्चों की सीखने की क्षमता, मौसम की परिस्थितियां, और शैक्षणिक निरंतरता सभी का संतुलन बना रहे.,बच्चे राष्ट्र का भविष्य हैं फैसले किताबों के नहीं, उनके हित के आधार पर होने चाहिए ।










