पाली।05 सितम्बर 2025 शुक्रवार
✍️न्यूज़ रिपोर्टर अजय कुमार जोशी।
“अपने हौसलों को यह मत कहो कि मेरी मुसीबतें कितनी बड़ी हैं, अपनी मुसीबतों को कहो कि मेरा हौसला कितना बड़ा है।” — यही जीवनमंत्र है मोहम्मद रफ़ीक, प्रधानाचार्य एवं अतिरिक्त मुख्य ब्लॉक शिक्षा अधिकारी, सोजत (पाली) का।
एक पैर से पूर्णतया दिव्यांग और आर्थिक रूप से

कमजोर पृष्ठभूमि के बावजूद रफ़ीक साहब ने कठिन परिश्रम और अटूट इच्छाशक्ति से अध्यापक पद से सेवा शुरू की और लगातार सफलता की सीढ़ियां चढ़ते हुए आज शिक्षा विभाग की प्रेरणास्रोत शख्सियत बन गए हैं।
रफ़ीक ने व्याख्याता (अर्थशास्त्र) के रूप में आठ वर्षों तक उत्कृष्ट सेवाएं दीं और लगातार कक्षा 12वीं बोर्ड परीक्षा का परिणाम 100 प्रतिशत बनाए रखा। इसके बाद तीन वर्ष तक प्रधानाध्यापक एवं 2017 से अब तक प्रधानाचार्य के पद पर रहते हुए शिक्षा की गुणवत्ता और विद्यालय विकास के कार्यों को नई दिशा दी। वर्तमान में वे सीबीईओ ऑफिस सोजत में अतिरिक्त मुख्य ब्लॉक शिक्षा अधिकारी के पद पर कार्यरत हैं।
कोविड-19 काल में पीईईओ के रूप में प्रभावी मॉनिटरिंग, पाली जिले की समान परीक्षा योजना, और शिक्षा विभाग के प्रशिक्षण कार्यक्रमों में दक्ष प्रशिक्षक की भूमिका निभाते हुए उन्होंने साबित किया कि दिव्यांगता कभी भी लक्ष्य प्राप्ति में बाधक नहीं बनती।
सामाजिक सरोकार के तहत उन्होंने भामाशाह सहयोग से विद्यालय विकास, स्काउट, परिवार नियोजन, वृक्षारोपण, परिंडा अभियान और पंचायत स्तर पर ड्रॉप आउट विद्यार्थियों को जोड़ने जैसे महत्वपूर्ण कार्य किए। इसी कारण उनकी पंचायत को दो बार “उजियारी पंचायत पुरस्कार” से नवाज़ा गया।
उनके कार्यों को देखते हुए रफ़ीक साहब को अब तक कई सम्मान प्राप्त हो चुके हैं —
जिला कलेक्टर सम्मान (26 जनवरी 2012, 15 अगस्त 2022)
शिक्षा विभाग जिला स्तरीय सम्मान (दो बार)
राज्य स्तरीय श्रेष्ठ निशक्त कार्मिक पुरस्कार (2011 एवं 2023, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग, राजस्थान सरकार)
हाल ही में परिंडा अभियान में सहयोग हेतु जिला कलेक्टर लक्ष्मी नारायण मंत्री द्वारा सम्मानित।
उनका मानना है कि सीखना और सिखाना ही शिक्षक का वास्तविक धर्म है। रफ़ीक साहब अक्सर हेलन केलर के प्रेरणादायी शब्दों को उद्धृत करते हुए कहते हैं— “मैं सब कुछ नहीं कर सकती, लेकिन मैं कुछ तो कर सकती हूँ, और सिर्फ इसलिए कि मैं सब कुछ नहीं कर सकती, मैं वो करने से पीछे नहीं हटूँगी, जो मैं कर सकती हूँ।”
अंत में वे युवाओं को संदेश देते हैं— “सोच को बदलो, सितारे बदल जाएंगे। नज़र को बदलो, नज़ारे बदल जाएंगे। कश्ती बदलने से होगा न कुछ, धारा को बदलो, किनारे बदल जाएंगे।”
✍️खब़रों पर नज़र सच के साथ वर्तमान टाईम्स










