हेरम्ब सर
मैं एक प्राइवेट टीचर हूँ
मैं एक प्राइवेट टीचर हूँ।
अक्सर लोग यह सुनते ही पूछते हैं—”सरकारी या प्राइवेट?” और जब मैं कहता हूँ “प्राइवेट”, तो सामने वाले के चेहरे का भाव अचानक बदल जाता है। जैसे मैंने कोई छोटा या कमतर काम बता दिया हो। उस पल दिल के भीतर एक टीस उठती है।
क्या प्राइवेट संस्थान में पढ़ाना गुनाह है? क्या बच्चों को शिक्षा और संस्कार देना केवल सरकारी नौकरी वालों का हक़ है?
मेरी दुनिया किताबों, कॉपियों और बच्चों की जिज्ञासु आँखों से भरी हुई है। मैं रोज़ सुबह इस उम्मीद के साथ क्लास में जाता हूँ कि शायद आज मेरी मेहनत किसी बच्चे के जीवन में एक नया दीपक जला देगी। मैं जानता हूँ कि शिक्षक का असली कर्तव्य केवल पढ़ाना ही नहीं बल्कि संस्कार देना, जीवन की राह दिखाना और बच्चे को समाज का अच्छा नागरिक बनाना भी है।
लेकिन गाँव और कस्बों की सच्चाई अलग है।
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प्राइवेट टीचर का सम्मान अक्सर सरकारी टीचर जितना नहीं मिलता।
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हमें कम तनख्वाह में ही परिवार का गुज़ारा करना पड़ता है।
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कई बार बच्चे भी समझते हैं कि “प्राइवेट टीचर” का मतलब है “कम महत्व वाला शिक्षक”।
सबसे कठिन क्षण वह होता है जब कोई पूछे—”क्या करते हो?” और मैं जवाब दूँ—”मैं टीचर हूँ।” फिर तुरंत सवाल आता है—”सरकारी या प्राइवेट?” उस क्षण मेरे भीतर एक पीड़ा उठती है, मानो मेरे शिक्षक होने की असली पहचान केवल नौकरी की श्रेणी पर टिक गई हो।
लेकिन क्या शिक्षक की असली पहचान उसकी तनख्वाह या नौकरी के दर्जे से तय होती है?
मैं मानता हूँ कि नहीं।
एक शिक्षक का मूल्य उसकी ईमानदारी, उसके ज्ञान और उसके द्वारा बच्चों में जगाई गई शिक्षा की रोशनी से तय होना चाहिए।
हाँ, कभी-कभी पीड़ा होती है। सम्मान की कमी खलती है। पर जब कोई बच्चा आकर कहता है—”सर, आपने मुझे यह समझाया था और आज मैं सफल हुआ”—तो सारी थकान मिट जाती है। उस क्षण मुझे लगता है कि मैं सही राह पर हूँ, चाहे समाज मुझे कैसे भी देखे।
मैं आज भी यही कहूँगा—मैं एक प्राइवेट टीचर हूँ और मुझे इस पर गर्व है।










