उत्तर प्रदेश में शिक्षकों को अब शिक्षण नहीं, गिनती का काम सौंपा जा रहा है।
कभी बच्चों की, कभी फर्नीचर की, कभी नामांकन की और अब आवारा कुत्तों की गिनती।
यह आदेश न सिर्फ़ शिक्षकों की गरिमा पर चोट है, बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र की सोच पर भी एक करारा तमाचा है।
शिक्षक वह दीपक है जो समाज के अंधकार को दूर करता है,
लेकिन अफ़सोस❗
आज उसी दीपक को सड़क पर खड़ा कर
कुत्तों की गिनती करने का फरमान सुना दिया गया।
जो क़लम से तक़दीरें लिखता है, उसे तालीम से हटाया जा रहा है,
कभी जनगणना, कभी सर्वे, अब कुत्तों में उलझाया जा रहा है।
क्या यही शिक्षक का कर्तव्य है❓
जिस शिक्षक के कंधों पर देश का भविष्य टिका हो,
उसे प्रशासनिक विफलताओं का बोझ ढोने के लिए मजबूर किया जाए❓
सरकारें बदलती रहीं, नीतियाँ आती-जाती रहीं,
लेकिन एक बात स्थायी रही
शिक्षक सबसे आसान शिकार रहा।
जब सिस्टम नाकाम हुआ, तो शिक्षक को खड़ा कर दिया,
जो खुद जवाबदेह था, उसने ही सवाल शिक्षक पर मढ़ दिया।
आवारा कुत्तों की समस्या वास्तविक है,
लेकिन उसका समाधान शिक्षा विभाग क्यों❓
नगर निगम, पशुपालन विभाग, स्थानीय प्रशासन
इन सबकी मौजूदगी में शिक्षक को ही क्यों आगे किया गया ❓
यह आदेश न समाधान है, न संवेदनशीलता
यह तो सीधे-सीधे शिक्षक पद की अवमानना है।
हम पाठ पढ़ाने वाले हैं, सड़कें नापने वाले नहीं,
हम राष्ट्र निर्माता हैं, हर नाकामी के ठेकेदार नहीं।
आज अगर शिक्षक चुप रहा,
तो कल उसे हर असफल योजना का मोहरा बनाया जाएगा।
आज कुत्तों की गिनती है,
कल शायद कुछ और…
यह समय है कि शिक्षक समाज, शिक्षक संगठन
और जागरूक नागरिक एक स्वर में कहें
“शिक्षक का सम्मान करो,
उसे उसके मूल कर्तव्य से मत भटकाओ।”
हम झुकेंगे नहीं, हम बिकेंगे नहीं,
शिक्षक हैं हम, यूँ ही तमाशा बनेंगे नहीं।
शिक्षक का अपमान, देश के भविष्य का अपमान है।
और इसे अब और बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
✍️अकरम खान पाली










