पाली/सोजत:अजय कुमार जोशी। जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय, जोधपुर के मुख्य परिसर में सोमवार को शिक्षा व्यवस्था को झकझोर देने वाला दृश्य सामने आया। जोधपुर संभाग के समस्त निजी महाविद्यालयों के डायरेक्टर, अध्यक्ष, सचिव एवं प्रतिनिधि मंडल विद्यार्थियों से जुड़ी गंभीर समस्याओं—विशेषकर परीक्षा शुल्क में भारी बढ़ोतरी और परीक्षा फॉर्म भरने की अत्यंत सीमित समय-सीमा—को लेकर विश्वविद्यालय पहुंचे, लेकिन कुलपति कार्यालय के बाहर उन्हें दो से तीन घंटे तक सड़क पर बैठकर इंतज़ार करना पड़ा।
प्रतिनिधि मंडल में जोधपुर, पाली, जालौर, बाड़मेर सहित संभाग के निकटवर्ती एवं दूरदराज़ क्षेत्रों से आए कॉलेज संचालक शामिल थे। ये वे पदाधिकारी हैं जो केवल कुछ विद्यार्थियों नहीं, बल्कि लाखों विद्यार्थियों के शैक्षणिक भविष्य का मार्गदर्शन करते हैं। इसके बावजूद विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा उनसे संवाद नहीं किया गया, जिससे शिक्षा जगत में गहरी नाराजगी व्याप्त है।
कॉलेज प्रतिनिधियों ने बताया कि यह इंतज़ार कुछ मिनटों का नहीं, बल्कि लगातार कई घंटों तक कुलपति कार्यालय के बाहर सड़क पर बैठाकर कराया गया। हैरानी की बात यह रही कि विश्वविद्यालय परिसर में स्थित बृहस्पति भवन जैसा विशाल सभागार उपलब्ध होने के बावजूद प्रतिनिधि मंडल को वहां बैठने की अनुमति नहीं दी गई। इसे लेकर कॉलेज संचालकों ने विश्वविद्यालय प्रशासन की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े किए।
कॉलेज संचालकों का कहना है कि कुलपति पद का नाम भले ही ‘कुलगुरु’ कर दिया गया हो, लेकिन व्यवहार में संवाद, संवेदनशीलता और समन्वय की भावना नजर नहीं आई। उनका आरोप है कि इस रवैये से यह संदेश देने का प्रयास किया गया कि चाहे कितने भी प्रयास किए जाएं, उनकी समस्याओं और मांगों पर कोई विचार नहीं होगा।
परीक्षा शुल्क वृद्धि से विद्यार्थियों में भारी आक्रोश:

इधर, विश्वविद्यालय द्वारा परीक्षा शुल्क में की गई बढ़ोतरी को लेकर विद्यार्थियों एवं अभिभावकों में भारी आक्रोश देखने को मिल रहा है। जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय से संबद्ध महाविद्यालयों के प्रथम वर्ष के विद्यार्थियों से ₹3100 परीक्षा शुल्क लिया जा रहा है, जबकि अन्य विश्वविद्यालयों में यह शुल्क मात्र ₹1300 निर्धारित है। इस बड़े अंतर को लेकर विद्यार्थियों का कहना है कि समान शैक्षणिक व्यवस्था में इस प्रकार का शुल्क भेदभाव पूर्णतः अनुचित है।

इसके साथ ही परीक्षा फॉर्म भरने के लिए अत्यंत सीमित समय दिया गया है। विद्यार्थियों एवं कॉलेज प्रबंधन का कहना है कि कुछ ही दिनों में पूरी प्रक्रिया करना व्यावहारिक नहीं है, जिससे तकनीकी परेशानियां बढ़ रही हैं और आर्थिक दबाव भी विद्यार्थियों पर पड़ रहा है।
कॉलेज प्रतिनिधियों ने स्पष्ट रूप से कहा कि जब कॉलेज संचालक ही विद्यार्थियों की समस्याओं को लेकर विश्वविद्यालय प्रशासन से नहीं मिल पा रहे हैं, तो दूरदराज़ क्षेत्रों से आने वाले सामान्य विद्यार्थियों की सुनवाई कैसे होगी, यह एक गंभीर और चिंताजनक प्रश्न है।
इस पूरे घटनाक्रम को लेकर निजी महाविद्यालयों के प्रतिनिधियों, शिक्षाविदों एवं विद्यार्थी संगठनों ने राज्य सरकार और उच्च शिक्षा विभाग से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है, ताकि विश्वविद्यालय प्रशासन की जवाबदेही तय हो, परीक्षा शुल्क वृद्धि पर पुनर्विचार किया जाए और विद्यार्थियों को शीघ्र राहत मिल सके।










