नई दिल्ली मेडिकल क्षेत्र में बेरोज़गारी की आशंका अब केवल अटकल नहीं रही, बल्कि देश के कई हिस्सों से सामने आ रहे उदाहरण इस संकट को पुष्ट कर रहे हैं ।
विश्वस्त सूत्रों के अनुसार तमिलनाडु समेत कुछ राज्यों में MBBS पास युवा डॉक्टर अब जीविकोपार्जन के लिए ऐसे कार्य करने को मजबूर हैं, जिनसे उनका पेशेवर स्तर मेल नहीं खाता। विशेषज्ञ इसे प्रणाली में गहराते असंतुलन का परिणाम मान रहे हैं ।
“कितने सपने उजड़ जाते हैं हालात की आंधी में,
योग्यता आँक नहीं पाती जब बाज़ार की मांगों से ।”
साढ़े पाँच वर्ष की मेडिकल शिक्षा, और नौकरी गिग वर्क जैसी
MBBS की साढ़े पाँच वर्ष की कठिन और खर्चीली पढ़ाई पूरी करने के बाद, कई युवा डॉक्टरों को नौकरी के अभाव में गिग वर्क की ओर रुख करना पड़ रहा है ।
चिकित्सा जगत से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि यह स्थिति न केवल शिक्षा प्रणाली की कमजोरी उजागर करती है बल्कि युवाओं में निराशा और मानसिक दबाव भी बढ़ाती है ।
परिवारों ने बेची जमीन, लिया कर्ज पर भविष्य अनिश्चित
निजी मेडिकल कॉलेजों की बढ़ती फीस एक और बड़ा मुद्दा बनकर उभर रहा है ।
कई परिवार MBBS की फीस चुकाने के लिए जमीन बेचते हैं या ऊँचे ब्याज पर कर्ज लेते हैं।
लेकिन पढ़ाई पूरी होने के बाद रोजगार न मिलना पूरे परिवार के लिए सदमे जैसा बन रहा है ।
“उम्रभर की बचत भी जब एक डिग्री में डूब जाए,
और फिर भी मंज़िल न मिले तो दर्द बयां नहीं होता ।”
मेडिकल कॉलेजों की फीस पर निगरानी का अभाव
विशेषज्ञों का सवाल है कि देश में कोई ऐसी स्वतंत्र एजेंसी क्यों नहीं है जो निजी मेडिकल कॉलेजों की फीस और सीट वितरण की तर्कसंगतता की जांच कर सके।
MBBS सीटों की फीस 70 लाख से एक करोड़ रुपये तक पहुँचने के बाद भी गुणवत्ता और रोजगार दोनों ही सवाल के घेरे में है ।
नीति आयोग के समक्ष उठते सवाल क्या और मेडिकल कॉलेजों की आवश्यकता है ❓
चिकित्सा क्षेत्र के विश्लेषकों की राय है कि देश में मेडिकल कॉलेजों की बढ़ती संख्या की तुलना में रोजगार के अवसर नहीं बढ़े हैं ।
नीति आयोग से यह भी सवाल उठ रहा है कि क्या देश को वास्तव में नए मेडिकल कॉलेजों की जरूरत है,
या
पुराने ढांचे को मजबूत करना ही प्राथमिकता होनी चाहिए ।
सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं से निजी डॉक्टरों पर असर
केंद्र और राज्य सरकारों की स्वास्थ्य योजनाओं ने मरीजों को सुविधा अवश्य दी है,
लेकिन छोटे क्लीनिक और मध्यम स्तर के नर्सिंग होम इससे बुरी तरह प्रभावित हुए हैं ।
अधिकांश मरीज केवल उन्हीं बड़े अस्पतालों में जाना पसंद करते हैं जो सरकारी योजनाओं से संबद्ध हों ।
इस बदलाव का सीधा असर निजी डॉक्टरों के रोजगार पर पड़ रहा है ।
मेडिकल एजुकेशन एक लाख करोड़ का वार्षिक कारोबार
विश्लेषकों का कहना है कि मेडिकल एजुकेशन क्षेत्र अब पूरी तरह व्यावसायिक हो चुका है।
देश में मेडिकल शिक्षा का सालाना कारोबार एक लाख करोड़ रुपये से अधिक का आंकड़ा पार कर चुका है ।
फीस, डोनेशन और बढ़ती बेरोज़गारी ने इस क्षेत्र की वास्तविकता को कठोर रूप से उजागर किया है ।
“इल्म अगर बोली में बिकने लगे,
तो इंसानियत का जागना मुश्किल हो जाता है ।”
स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि वर्तमान हालात नहीं सुधरे, तो आने वाले वर्षों में मेडिकल प्रोफेशन में बेरोज़गारी चरम पर पहुंच सकती है ।
इसका प्रभाव न केवल युवाओं पर बल्कि देश की संपूर्ण स्वास्थ्य व्यवस्था पर पड़ेगा ।
संवाददाता – अकरम खान पाली










