“हर बेटी का हक़—बराबर सम्मान और बराबर अवसर”
राज्य सरकार द्वारा बालिका शिक्षा फाउंडेशन की “आपकी बेटी शिक्षा योजना” निश्चित रूप से एक सराहनीय कदम है।
गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाली, माता–पिता से वंचित बालिकाओं के लिए 2100/- और 2500/- रुपये की आर्थिक सहायता उनकी शिक्षा को सहारा देती है।
योजना का उद्देश्य पवित्र है परंतु इसके दायरे में एक गहरी कमी आज भी चुभती है।
राजकीय विद्यालयों में पढ़ने वाली बेटियां ही क्यों❓
गैर सरकारी विद्यालयों में शिक्षा ले रही बेटियां क्या किसी और मिट्टी की बनी हैं❓
एक जैसी धरती, एक जैसा आसमान…
फिर संरक्षण और अवसरों में भेद क्यों❓
“नफरत नहीं, पर फर्क क्यों❓
ये सवाल बेटियों की आँखों में चमकता है,
हक़ की रोशनी सबके लिए है,
फिर रास्ता किसी का कम क्यों दिखता है❓”
गैर सरकारी विद्यालयों में पढ़ने वाली बालिकाएँ भी इस प्रदेश की बेटियाँ हैं।
उनके सपने भी उतने ही बड़े हैं, उतने ही पवित्र हैं, और उतने ही संघर्षपूर्ण।
सरकारी नीति का यह विभाजन
एक बेटी को अधिकार और दूसरी को इंतज़ार
न्याय की भावना को कमजोर करता है।
“बेटियाँ तो दो ही घरों की शान होती हैं,
किसी स्कूल की चौखट से उनकी पहचान नहीं होती।
फरिश्तों के पंखों पर भी रंग अलग नहीं होते,
फिर इंसान की बेटियों पर यह इंसानी फ़र्क क्यों होती❓”
यह सच है कि सहायता राशि समय पर देकर सरकार ने एक सुसंगठित प्रक्रिया स्थापित की है
25 नवंबर तक ऑनलाइन आवेदन,
30 नवंबर तक सत्यापन,
और फिर आर्थिक सहायता का वितरण।
परंतु सवाल यह नहीं कि प्रक्रिया कितनी सुंदर है,
सवाल यह है कि कितनी न्यायपूर्ण है ❓
एक ओर प्रदेश “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” का नारा देता है,
दूसरी ओर बेटियों को ही दो वर्गों में बाँट देता है
एक सरकारी, एक गैर-सरकारी।
क्या अधिकार का आधार स्कूल होना चाहिए, या बेटी होना❓
“हक़ की धूप हो, या सपनों राज्य सरकार द्वारा बालिका शिक्षा फाउंडेशन की “आपकी बेटी शिक्षा योजना” निश्चित रूप से एक सराहनीय कदम है।की छाँव,
बेटियों के हिस्से में बराबरी आनी चाहिए।
जो बेटी कल देश बदलेगी,
उसे आज दो कतारों में क्यों बाँटा जाना चाहिए❓
गैर सरकारी विद्यालयों की बेटियाँ भी आर्थिक चुनौतियों से घिरी होती हैं।
अनेकों परिवार कर्ज लेकर, मेहनत करके, मजदूरी करके
अपनी बच्ची को बेहतर शिक्षा दिलाने का प्रयास करते हैं।
उन पर भी वही दुख, वही संघर्ष, वही उम्मीदें टिकती हैं।
उनकी आँखों में भी वही रोशनी जलती है
जिस रोशनी से देश का भविष्य चमकता है।
सरकार की योजना का उद्देश्य बेटियों को सशक्त बनाना है,
तो उसे स्कूल के आधार पर बाँटना
उस उद्देश्य को अधूरा कर देता है।
“बेटी का दर्ज़ा कम न आँकना,
वो तो वक़्त आने पर इतिहास लिख देती है।
जिस पंख को बराबर हवा न मिले,
वो उड़ान में भला किससे जीत लेती है❓”
आज ज़रूरत है एक ऐस नीति की जो बेटियों को सूची, श्रेणी, स्कूल या वर्ग से ऊपर उठाकर देखे।
जो केवल यह कहे
“तुम बेटी हो, इतना ही पर्याप्त है।”
क्योंकि किसी भी समाज की असली ताकत उसकी बेटियों की मुस्कान और शिक्षा में बसती है।
✍️विशेष रिपोर्ट -अकरम खान पाली











