*द्वारका: समुद्र के गर्भ में सोई श्रीकृष्ण की नगरी फिर बनी चर्चा का केंद्र,वैज्ञानिक खोजों से साबित हुआ अस्तित्व, फिर डूब सकती है पौराणिक द्वारका!*

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“समुद्र के गर्भ से फिर उभरी द्वारका की गाथा – विज्ञान ने दी पौराणिक कथा को नई सच्चाई!”

देवभूमि द्वारका। समुद्र की लहरों के नीचे छिपे रहस्य अब धीरे-धीरे उजागर हो रहे हैं। श्रीकृष्ण की पौराणिक नगरी — द्वारका — के अस्तित्व को अब तक की वैज्ञानिक, भूवैज्ञानिक और पुरातात्विक खोजों ने और भी मजबूती से प्रमाणित कर दिया है। राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्थान (CSIR–NIO), भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI), भारतीय नौसेना और डेक्कन कॉलेज पुणे जैसे संस्थानों के संयुक्त अनुसंधान में समुद्र के तल पर मिली संरचनाओं ने यह साफ संकेत दिए हैं कि द्वारका वास्तव में अस्तित्व में थी — और संभवतः कई बार समुद्र में डूबी भी।

🌊 समुद्र के नीचे मिली प्राचीन नगरी के प्रमाण-

वर्ष 2001 से लेकर 2007 तक अरब सागर की गहराइयों में सोनार मैपिंग, रिमोट ऑपरेटेड व्हीकल (ROV) और प्रशिक्षित गोताखोरों की मदद से की गई खोजों में महल, सड़कों, दीवारों, खंभों, लंगरों और बर्तनों के अवशेष मिले हैं। इनकी रेडियो कार्बन डेटिंग से उनकी आयु 9000 से 5000 वर्ष पूर्व तक की पाई गई है। कई त्रिकोणीय पत्थर के लंगर, आभूषण, मिट्टी के बर्तन, सिक्के और औजार भी खोजे गए — जो मेसोपोटामिया, ओमान और बहरीन में मिले वस्तुओं से मेल खाते हैं। इससे संकेत मिलता है कि द्वारका प्राचीन काल में एक महत्वपूर्ण समुद्री व्यापारिक बंदरगाह रही होगी।

🪶 मोदी की स्कूबा डाइविंग से फिर चर्चा में आई द्वारका-

25 फरवरी 2024 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वयं स्कूबा डाइविंग कर समुद्र में अवशेषों के दर्शन किए और वहाँ मोर पंख अर्पित कर श्रद्धांजलि दी।
इस घटना ने न केवल आध्यात्मिक दृष्टि से द्वारका को नई पहचान दी, बल्कि वैज्ञानिक जगत का ध्यान भी एक बार फिर इस प्राचीन नगरी की ओर आकर्षित किया।

🔬 भूवैज्ञानिकों की थ्योरी — समुद्र स्तर और द्वारका का डूबना-

CSIR–NIO के प्रमुख वैज्ञानिक डॉ. राजीव निगम बताते हैं कि लगभग 15,000 वर्ष पूर्व समुद्र का स्तर आज की तुलना में 100 मीटर कम था।
लगभग 3500 वर्ष पहले समुद्र स्तर में गिरावट आने पर भूमि ऊपर आई और तब द्वारका की स्थापना हुई। लेकिन बाद में समुद्र स्तर बढ़ने, जलवायु परिवर्तन और भूगर्भीय गतिविधियों के कारण द्वारका धीरे-धीरे डूबती चली गई।

🧱 पुरातत्विक खोजें और पुराणों का संगम-

पुराणों, महाभारत और श्रीमद्भागवत महापुराण में द्वारका के निर्माण और विनाश का विस्तृत वर्णन मिलता है। पुरातत्वविदों को नवमी शताब्दी के विष्णु मंदिर के अवशेष, प्राचीन दीवारें और इंटरलॉकिंग तकनीक से बनी संरचनाएं मिलीं — जो उस समय की उन्नत इंजीनियरिंग समझ को दर्शाती हैं। स्थानीय परंपरा के अनुसार द्वारका छह बार डूब चुकी है — और हर बार एक नई द्वारका का निर्माण हुआ।

🌍 दुनिया में और भी डूबी सभ्यताएं-

द्वारका जैसी घटनाएं केवल भारत तक सीमित नहीं। ग्रीस का सेंटोरिन, ऑस्ट्रेलिया के तटीय नगर, सोलोमन द्वीप समूह — सभी में समुद्र में डूबी प्राचीन सभ्यताओं के प्रमाण मिले हैं।
2004 की सुनामी में महाबलीपुरम (तमिलनाडु) के तट पर भी समुद्र ने कुछ प्राचीन संरचनाओं को उजागर किया था।

⚠️ भविष्य की चेतावनी: फिर डूब सकती है तटीय गुजरात-

नेचर कम्युनिकेशंस जर्नल की रिपोर्ट बताती है कि समुद्र स्तर में निरंतर वृद्धि से आने वाले समय में सूरत, कच्छ, भावनगर, भरूच जैसे जिले गंभीर रूप से प्रभावित हो सकते हैं। जामनगर, देवभूमि द्वारका, पोरबंदर, जूनागढ़ आदि क्षेत्र भी हल्के या मध्यम रूप से जलवायु परिवर्तन की मार झेल सकते हैं।

🧭 द्वारका — आस्था, इतिहास और विज्ञान का संगम-

पुराणों के आख्यान, भूविज्ञान की पड़ताल और समुद्र की गहराई में मिले अवशेष — तीनों मिलकर यह सिद्ध करते हैं कि द्वारका कल्पना नहीं, एक वास्तविक ऐतिहासिक नगरी थी।
आधुनिक तकनीक और भविष्य की खोजें इस रहस्यमयी नगरी के और रहस्यों को उजागर करने का वादा कर रही हैं।

संकलन -चेतन व्यास (द्वारका) व अजय कुमार जोशी (राजस्थान)

Ajay Joshi
Author: Ajay Joshi

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