
प्राचीन ऐतिहासिक शहर सोजत के 972 वें स्थापना वर्ष में प्रवेश कर रहा है इसको लेकर नगर वासियों में जोरदार उत्साह है पुलिस थाना रोड के सामने कुम्हारों के बास में एक टेकरी पर स्थित अधिष्ठात्री देवी सेजल माता के मंदिर पर नवरात्रि के नौ दिनों तक सोजत स्थापना दिवस की पूर्व संध्या तक भजन संध्याओं शोभा यात्रा जुलूस निकलागा जाऐगा यह जानकारी सेजल माता मंडल के भीकाराम प्रजापत ने दी। सोजत के प्राचीन इतिहास की जानकारी संकलन कर्ता चेतन व्यास के अनुसार यह नगरी अति प्राचीन हैं सोजत से सांभर क्षेत्र के बीच प्राप्त तांबे के सिक्कों से ज्ञात होता है कि चप्टन ने 120 ई. में पश्चिमी देश के उपरी जनपद को जीता था जिसमें रोहट-जैतारण आदि तक का क्षेत्र सम्मिलित था।यात सोजत रा परगणा री में जसवंतसिंह प्रथम के दिवान मुथा नैणसी ने 300 वर्ष पूर्व इतिहास संकलन कर लिखा है कि शास्त्री में इसका नाम शुद्धदंती मिलता है तथा त्रंबावति नाम राजा त्रवण सैन के कारण पड़ा। आयु और अजमेर के बीच किराडु लौद्रवा एवं पुंगल क्षेत्र में पंवारों का राज हुआ करता था। इस कारण पडा सोजत नाम: राजा त्रवण सैन पंवार की देव स्वरूपा पुत्री सेजल ने किसी कारणवश अपने पिता को शाप दे।
दिया एवं इसके सेनापति बांधरहुल को आशीर्वाद दिया कि यहां पर तुम राज करना तथा इस नगरी को मेरा नाम देना विकम संवत 1111 की आसोज सुदी नवमी ईस्वी सन् 1054 को इसका नाम सोजत रखा गया तथा उतर दिशा में पावटा के पीछे इसने बागेलाव तालाब बनवाया इस वंश का प्रसिद्ध शासक हरिसिंह हुल हुआ जिसने हरियामाली भी बसाया इसके बाद सोजत पर मेवाड के राणाओ, सोनगरा, सिंधल एवं राठौड वंश के शासकों ने राज किया एवं विरमदेव बाधावत देव स्वरूप शासक रहा जिसका दुर्ग में दिवला बना हुआ है यहां पर राव मालदेव राय चन्द्रसेन का राज तिलक भी हुआ इसी दुर्ग में उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचन्द के अनुसार वीर दुर्गादास राठौड़ की माता नेतकंवर का दाह संस्कार हुआ।
तीन सौ वर्ष पूर्व यह मिला वर्णन :
आज से 300 साल पहले मुथा नैणसी ने अपने वर्णन में लिखा छोटी सी भाकरी पर छोटा सा फोट जिसमे सादे निवास है कई घर गिरे हुये थे एक घर राजा गजसिंह के समय नया बना पायगा में दस घोडे बन्धे हुये थे घर के बाहर दरबार बैठने का चबुतरा था गढ़ को प्रोल राव निम्या जोधावत ने चनायी किले, के नीचे परकोटा तुकों ने चनाया प्रोल के पास उपर दिवान खाना नीचे कोठार है समीप ही चत्रभुज का मंदिर है जिसके पास संन्यासी गौतमगिरीजी की समाधी है (फाल्गुन माह 1716 को पा. रामदास ने सोजत में 2254 घरी की बस्ती बताई।
यह थे धार्मिक स्थल – 300 वर्ष पहले के वर्णन से ज्ञात होता है कि सोजत में उस समय 8 शिवालय, 8 देवालय, 3 ठाकुर द्वारे, चत्रभुज, लक्ष्मीनारायण, मुलनायक थे। वही महादेवजी के जो स्थल थे। उनमे पातालेश्वर, जोगेश्वर, नीलकण्ठ, सुरेश्वर, बागेलाव, कपालेश्वर आदि थे।
इन सूरबीरी संतो क्षत्राणियों का परचा रहा:-
सोजत में देवी सेजल, हरिसिंह हुल, सेचग अलगू श्रीमाली ब्राहमण गाधा, संयासी गौतम गिरी, राव रिडमल, राव जोधा, राध चन्द्रसेन, राब राम, बिरम दे।
महाराजा विजय सिंह, गुलाबराय, चीर दुर्गादास राठौड, राव कल्ला, नेतकंवर, गुरू फूलकरामण, गुन्न ब्रहम नारायण, मुकन नारायण, रघुनाथ मल सिंघवी, हरिभाई किंकर, मीठालाल काका, मिश्रीमल जी महाराज, चरण दास जी महाराज, पूरण दास जी महाराज, संतोष गिरी जी महाराज आदि की कर्म एवं जन्म भूमि रही है सोजत ।










