सोजत। अजय कुमार जोशी। रियासत कालीन मारवाड़ में सोजत परगने का विशेष महत्व रहा है। इतिहास साक्षी है कि राव मालदेव का राजतिलक 5 जून 1531 ईस्वी को सोजत में ही हुआ था। जब तक राव मालदेव सोजत के ब्राह्मणों के संपर्क में रहे, वे अजेय बने रहे; किंतु जैसे ही वे वीरमदेव के छल जाल में फंसे, उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा। इसका ज्वलंत उदाहरण शेरशाह सूरी के साथ हुआ प्रसिद्ध गिरी-सुमेल युद्ध है।
सोजत महोत्सव समिति के तत्वावधान में अभिनव कला मंच के सचिव चेतन व्यास द्वारा संकलित सोजत के गौरवशाली इतिहास पर प्रकाश डालते हुए बताया गया कि राव मालदेव के पश्चात 1562 ईस्वी में राव चंद्रसेन जोधपुर की गद्दी पर बैठे।
परंतु, गद्दी पर बैठते ही उन्हें अपने ही भाइयों के षड्यंत्रों का शिकार होना पड़ा। उनका भाई राम सोजत में रहकर उपद्रव करने लगा। 1563 में चंद्रसेन ने उस पर चढ़ाई कर संधि कर ली, किंतु 1564 में राम अकबर के पास सहायता हेतु पहुँचा। अकबर ने अपने सिपहसालार हुसैन कुली खाँ को आदेश दिया कि सोजत पर अधिकार कर रामसिंह को परगना दिलवाया जाए। इस संघर्ष में राव चंद्रसेन के भतीजे वीर कल्ला ने अदम्य शौर्य दिखाते हुए वीरगति पाई।
इसके उपरांत मुगलों का सोजत पर अधिकार हो गया, किंतु 7 जुलाई 1580 को राव चंद्रसेन ने मुगल सेना पर आक्रमण कर सोजत पर पुनः अधिकार प्राप्त कर लिया।
संवत 1635 में सरवाड़ में युद्ध के दौरान व्यास पदमो जी ने राव चंद्रसेन की रक्षा करते हुए अपने प्राणों की आहुति दी। इसके बाद भी चंद्रसेन ने हार नहीं मानी और हरियामाली व सारण की पहाड़ियों से संघर्ष जारी रखा।
अंततः 11 जनवरी 1581 ईस्वी को सिरयारी की पहाड़ियों में उनका निधन हो गया। आज भी वहां उनकी पुतली का स्मारक स्थित है।
इतिहासकार मानते हैं कि जिस प्रकार महाराणा प्रताप ने अकबर से संघर्ष किया, उसी कालखंड में राव चंद्रसेन ने भी सोजत, हरियामाली, सारण, सिरयारी और पूरे मारवाड़ की धरती पर मृत्यु पर्यन्त संघर्ष कर वीरता का अद्वितीय उदाहरण प्रस्तुत किया।










