




सोजत (पाली) | विश्व की प्राचीनतम पर्वत श्रृंखला अरावली की गोद में बसे सोजत के भौगोलिक और ऐतिहासिक अस्तित्व पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। सुप्रीम कोर्ट द्वारा अरावली को परिभाषित करने के लिए तय किए गए ‘100 मीटर ऊंचाई’ के नए मानक ने सोजत की प्रसिद्ध भाखरियों (पहाड़ियों) को संरक्षण के दायरे से बाहर होने की कगार पर खड़ा कर दिया है। इस फैसले के बाद प्रदेश के करीब 11 हजार टीले और पहाड़ियां अरावली की श्रेणी से बाहर हो जाएंगे।
ऐतिहासिक दुर्ग और नानी सीरड़ी का वजूद दांव पर सोजत की पहचान यहाँ की प्राचीन ग्रेनाइट पहाड़ियों से है। वर्ष 1460 में राव जोधा के पुत्र नीम्बा ने ‘नानी सीरड़ी’ पहाड़ी पर ही सोजत दुर्ग का निर्माण करवाया था। इसके अतिरिक्त नरसिंह भाखरी, चामुंडा माता भाखरी और मोडी महादेव जैसी पहाड़ियां सोजत की प्राकृतिक सुरक्षा दीवार रही हैं। स्थानीय विशेषज्ञों का कहना है कि सोजत की सात पहाड़ियों में से कई तो पहले ही खनन की भेंट चढ़ चुकी हैं, और अब कानूनी परिभाषा बदलने से शेष बची पहाड़ियों के अस्तित्व पर भी तलवार लटक गई है।
पर्यावरण के लिए घातक हो सकता है फैसला भारतीय वन सर्वेक्षण के आंकड़ों के अनुसार, राजस्थान के 15 जिलों में 20 मीटर से ऊंचे 12,081 पहाड़ व टीले हैं, जो रेगिस्तान के विस्तार को रोकने में बड़ी भूमिका निभाते हैं। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार, अब केवल 1,048 पहाड़ ही (जो 100 मीटर से ऊंचे हैं) अरावली माने जाएंगे। सोजत क्षेत्र की कई महत्वपूर्ण पहाड़ियां 100 मीटर से कम ऊंची होने के कारण अब ‘अरावली’ नहीं कहलाएंगी, जिससे उन पर खनन और अतिक्रमण का खतरा बढ़ जाएगा।
सामाजिक संस्थाओं ने जताई एकजुटता सोजत की विरासत को बचाने के लिए ‘अरावली बचाओ अभियान’ को शहर की सभी प्रमुख संस्थाओं ने पुरजोर समर्थन दिया है। समर्थन देने वालों में वरिष्ठ नागरिक समिति के अध्यक्ष सुरेश ओझा, पेंशनर समाज के लालचंद मोयल, चारण गढ़वी इंटरनेशनल फाउंडेशन के अनोपसिंह लखावत, अभिनव कला मंच के गोरधन लाल गहलोत व सचिव चेतन व्यास पर्यावरण सुधार न्यास अध्यक्ष अजय जोशी शामिल हैं।
इसके साथ ही सोजत सेवा मंडल के पुष्पत राज मुणोत, भारत विकास परिषद् के देवीलाल सांखला, सामाजिक वेलफेयर फाउंडेशन के राम स्वरूप भटनागर, मानव सेवा समिति के राजेश अग्रवाल सहित हितेंद्र व्यास, डॉ. रशीद गोरी, सत्तू सिंह भाटी, अशोक सैन, ताराचंद सैनी, जवरीलाल बौराणा और राज कुमार चौधरी ने भी इस अभियान को अपनी सहमति देते हुए पहाड़ियों के संरक्षण की मांग की है।
जीवनरेखा पर प्रहार अरावली पर्वतमाला गुजरात से दिल्ली तक फैली है और इसका 80% विस्तार राजस्थान में है। सोजत इस श्रृंखला का अभिन्न हिस्सा है। पर्यावरण प्रेमियों का कहना है कि यदि इन छोटी पहाड़ियों का संरक्षण छिन गया, तो क्षेत्र के तापमान और पारिस्थितिकी तंत्र पर इसके विनाशकारी प्रभाव पड़ेंगे।










