विरावल (गुजरात)। ✍️खबरों पर नज़र सच के साथ वर्तमान टाईम्स न्यूज
विरावल। स्कंध पुराण के प्रभास खंड में वर्णित भगवान श्रीकृष्ण के बैकुंठ गमन की पावन कथा आज भी गुजरात के भाल्लका तीर्थ में सजीव है।
सोजत की सामाजिक संस्था “अभिनव कला मंच” के सचिव चेतन व्यास ने द्वारका, सोमनाथ और विरावल क्षेत्र की धार्मिक, सांस्कृतिक एवं पुरातात्त्विक जानकारी एकत्रित करने के दौरान यह महत्वपूर्ण तथ्य उजागर किया कि भगवान श्रीकृष्ण 125 वर्ष तक जीवित रहे और उनका देहावसान प्रभास क्षेत्र में एक सामान्य मनुष्य की भाँति हुआ।

🌿 यादवों का अंत और श्रीकृष्ण की समाधि- कथानक के अनुसार, द्वारका में शासन के अंतिम काल में यादवों का आपसी कलह बढ़ गया। मद्यपान में चूर यादव एक-दूसरे से युद्ध करने लगे और अंततः उनका संहार हो गया। इस दुखद दृश्य से खिन्न होकर भगवान श्रीकृष्ण प्रभास क्षेत्र में भाल्लका तीर्थ पहुँचे और एक पीपल वृक्ष के नीचे योग समाधि में बैठ गए। उसी समय जरा नामक व्याध (भील शिकारी) ने भगवान के चरण कमलों में अंकित पद्मचिह्न को मृग का मुख समझकर उन पर तीर चला दिया। तीर उनके दाहिने पैर के तल में लगा। जब व्याध अपने “शिकार” के पास पहुँचा, तो उसने देखा कि सामने कोई मृग नहीं, बल्कि स्वयं पिताम्बरधारी पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण हैं। भय और पश्चाताप से काँपते हुए उसने क्षमा माँगी।
भगवान श्रीकृष्ण ने स्नेहपूर्वक कहा- “जो कुछ हुआ है, वह मेरी ही इच्छा से हुआ है।” यह कहकर उन्होंने व्याध को क्षमा किया और अपनी दिव्य कान्ति से वसुंधरा को आलोकित करते हुए निजधाम प्रस्थान किया।
🕊️ ‘भाल्लका’ नाम की उत्पत्ति- किंवदंती के अनुसार, व्याध ने भगवान को भल्ल (बाण) मारा था, इसी कारण इस स्थल का नाम भाल्लका तीर्थ पड़ा। मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने द्वारका में 36 वर्ष तक शासन किया और 125 वर्ष की आयु में यहाँ देह त्याग किया। आज भी इस तीर्थस्थल पर शैया पर विराजमान भगवान श्रीकृष्ण की प्रतिमा, उनके पैर में लगे तीर की प्रतिकृति, और प्राचीन पीपल वृक्ष का अवशेष तना उस ऐतिहासिक क्षण के मौन साक्षी हैं।
🌊 त्रिवेणी संगम और पौराणिक धरोहरें- भाल्लका तीर्थ के आसपास का क्षेत्र धार्मिक और पुरातात्त्विक दृष्टि से अत्यंत समृद्ध है। यहाँ महादेव मंदिर, राम मंदिर, परशुराम तपस्या स्थली, हिंगलाज माता मंदिर,सूर्य कुंड, भीमनाथ महादेव मंदिर, बलदेव गुफा मंदिर, और शंकराचार्य जी की गुफा स्थित हैं। इसी क्षेत्र में त्रिवेणी संगम है, जहाँ हिरण, कपिला और सरस्वती नदियाँ सागर में मिलती हैं। यह संगम स्थल अपने स्वच्छ जल, शांत वातावरण और जलमग्न दो विशाल शिवलिंगों के कारण श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र है।
✍️ चेतन व्यास का कथन-
अभिनव कला मंच के सचिव चेतन व्यास ने बताया कि -“भाल्लका तीर्थ केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि यह भारतीय संस्कृति, आस्था और इतिहास का जीवंत प्रतीक है। यहाँ की हर लहर, हर वृक्ष और हर पत्थर आज भी उस क्षण को सजीव रखे हुए है जब भगवान श्रीकृष्ण ने मानव रूप में देह त्याग कर निजधाम की ओर प्रस्थान किया।”
🌸 श्रद्धा और विश्वास का संगम स्थल-आज भी देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालु जब भाल्लका तीर्थ पहुँचते हैं, तो वे न केवल दर्शन करते हैं, बल्कि स्वयं को उस दिव्य क्षण का साक्षी अनुभव करते हैं। यह पावन तीर्थ भगवान श्रीकृष्ण की अंतिम लीला का प्रतीक बनकर सत्य, त्याग और करुणा की अमर गाथा सुनाता रहता है।
✍️ न्यूज़ रिपोर्टर अजय कुमार जोशी










