सोजत में झूलेलाल मंदिर में चालिया महोत्सव का श्रद्धामय समापन
भजन-अरदास और पल्लव से गूंजा मंदिर परिसर, भगवान झूलेलाल के जयकारों पर झूमे श्रद्धालु
रिपोर्टर – नवनीत राय ‘रुचिर’
सोजत। शहर के सिंधी समाज के आराध्य भगवान झूलेलाल के मंदिर में पिछले 40 दिनों से श्रद्धा और भक्ति की अविरल धारा के रूप में चल रहे चालिया महोत्सव का मंगलवार को श्रद्धापूर्वक समापन हुआ। अंतिम दिन मंदिर परिसर में बड़ी संख्या में समाजबंधु उमड़े और भगवान झूलेलाल की पूजा-अर्चना, भजन, अरदास एवं पल्लव में सहभागी होकर सुख-समृद्धि और खुशहाली की कामना की।
चालीस दिनों तक चले इस धार्मिक अनुष्ठान के अंतिम दिन मंदिर परिसर का वातावरण विशेष रूप से भक्तिमय नजर आया। वरुण वंशीय भरूच वाले गुरुजी मनीष लाल द्वारा भगवान झूलेलाल की विशेष पूजा-अर्चना के बाद भजन मंडलियों ने सिंधी एवं भक्तिमय भजनों की मनोहारी प्रस्तुतियां दीं। मधुर भजनों और भगवान झूलेलाल के जयकारों के बीच श्रद्धालु भावविभोर होकर झूम उठे। मंदिर में भजनों के कार्यक्रम के बाद शोभा यात्रा के रूप में लायी ज्योति को रामेलाव तालाब में विसर्जित किया गया। पूरा कार्यक्रम देखते ही बनता था।
चालीस दिवसीय इस आयोजन में स्थानीय झूलेलाल म्यूजिकल ग्रुप के भजन गायक कलाकार राजेश लखानी, हीरालाल रामचंदानी, मनीष पुरुषवाणी, प्रगति पुरुषवाणी, राजू पुरुषवाणी आदि ने अपनी सरस भजनों की प्रस्तुतियों से उपस्थित धर्म श्रद्धालुओं को भावविभोर कर दिया। सिंधी समाज सोजत के प्रमुख समाजसेवी साजन हीरानी, बाबोसाब सुंदर दास आडवाणी, मुखीसाब दयाल दास पुरुषवाणी, केशियर जितेंद्र भागचंदानी, मुकेश हीरानी, दिलीप मुलानी, सुंदर मूलचंदानी, लक्ष्मण दास पारवाणी मामा चश्मा वाले, राजकुमार केवलानी सहित बड़ी संख्या में महिला-पुरुषों और युवाओं की उत्साहपूर्ण सहभागिता ने आयोजन को उल्लासमय बना दिया।
चालिया महोत्सव के दौरान प्रतिदिन रात्रि 9:30 से 11 बजे तक भजन आदि धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए गए। समाज के श्रद्धालुओं ने नियमित रूप से मंदिर पहुंचकर आराधना, भजन और अरदास में भाग लिया। महोत्सव ने न केवल धार्मिक आस्था को प्रगाढ़ किया, बल्कि समाज को अपनी सांस्कृतिक जड़ों और परंपराओं से जोड़ने का भी संदेश दिया।
तप, त्याग और संयम की साधना है चालिया
चालिया महोत्सव सिंधी समाज की आस्था और तपस्या की विशिष्ट परंपरा है। संकल्प लेने वाले श्रद्धालु पूरे 40 दिनों तक व्रत एवं संयम का पालन करते हैं। गृहस्थ जीवन में रहते हुए सात्विक दिनचर्या अपनाने के साथ केश नहीं कटवाना, प्रतिदिन प्रातःकालीन आरती में सहभागिता, सेवा एवं दान-पुण्य करना इस साधना का महत्वपूर्ण अंग है। अनेक श्रद्धालु पूरे अनुष्ठान काल में नंगे पांव रहकर भगवान झूलेलाल के प्रति अपनी अटूट श्रद्धा एवं समर्पण प्रकट करते हैं।
मंगलवार को महोत्सव के समापन के साथ चालीस दिनों की यह कठिन साधना पूर्ण हुई। श्रद्धालुओं ने भगवान झूलेलाल के चरणों में शीश नवाकर मंगलकामनाएं कीं। चालिया महोत्सव ने एक बार फिर सिंधी समाज की समृद्ध धार्मिक-सांस्कृतिक विरासत को जीवंत करने के साथ नई पीढ़ी को आस्था, संस्कार, सेवा और सामाजिक एकता से जोड़ने का प्रेरक संदेश दिया।










