राजस्थानी कविता : ऊंट– ऊंट उत्सव पर विशेष- नाचीज़ बीकानेरी

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ऊंट–
ऊंट उत्सव पर विशेष

धोरां री इय्यै मुळकती धरा रो ।
जीणै रो आधार ओ ‘ लाडेसर ऊंट ।।

ऊंट नै ‘राज-पशु’ सरकार बणायो ।
माण बधण सूं लाखिणो हुयो ऊंट ।।

ऊंटा सूं सजै जद राज – दरबार ।
चोपायां मे सिरै घणों हुवै है ऊंट ।।

ऊंट नै गदीदार पग कुदरत दिया ।
धोरां मे खातो घणौ चालै ओ ‘ ऊंट ।।

घणै दिनां तक भूख – तिस सै लेवै ।
ओ’ “रेगिस्तान रो जहाज” बाजै ऊंट ।।

मेळ- मगरियां अर तीज-उत्स्वां मे ।
गोरब्ंध – गैणा सूं सजधज चालै ऊंट ।।

ब्याव -सादी ऊंट नै बाराती सजावै ।
सेना – फौज में घणा उपयोगी हुवै ऊंट ।।

ऊंट घर-समाज रो माण-सम्मान बधावै ।
मरूधर में रोजी-यातायात रो साधन ऊंट ।।

ऊंटां रा टोला रा टोला पालै है राईका ।
सीमां माथै आगै-आगै गश्त करै ऊंट ।।

धोरां री धरा रा चावा-ठावा रईस- लोग ।
सवारी री ठसकाई करण सारु राखै ऊंट ।।

जिनावरां मे सगला सूं सिरै घणों हुवै ।
मोरी रै इसारै सू ‘करतब’ दिखावै ऊंट ।।

धोरां री धरा में सैलानयां नै रिझावंण ।
सालो- साल “ऊंट-उत्सव” नै सजै ऊंट ।।
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नाचीज बीकानेरी मो-9680868028

Vartmaan Times
Author: Vartmaan Times

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