सोजत में संत शिरोमणि लिखमीदासजी महाराज के 276वें जन्मोत्सव पर निकली भव्य कलश एवं शोभायात्रा, भक्ति रस में सराबोर रही भजन संध्या


सोजत। माली समाज के आराध्य देव एवं संत शिरोमणि श्री 1008 लिखमीदासजी महाराज के 276वें जन्मोत्सव के उपलक्ष्य में आयोजित दो दिवसीय धार्मिक कार्यक्रम श्रद्धा, भक्ति एवं उत्साह के साथ संपन्न हुए। जन्मोत्सव के अवसर पर मंगलवार रात्रि को आयोजित विशाल भजन संध्या में श्रद्धालु देर रात तक भक्ति रस में डूबे रहे, जबकि बुधवार प्रातः श्री लिखमीदासजी महाराज मंदिर (मेला का चौक) से भव्य कलश यात्रा एवं शोभायात्रा निकाली गई।

समाजसेवी मास्टर माणकचन्द टाक के मुताबिक शोभा यात्रा में माली समाज अध्यक्ष चम्पालाल सांखला, बड़ाबास चौधरी गोर्धनलाल गहलोत, पावटी बास चौधरी ताराचंद टाक, धोलीवाड़ी बास चौधरी गणपत लाल माली, नयापुरा पूर्व चौधरी लुम्बाराम माली, समाज के पंचगण पुष्प वर्षा कर सभी का स्वागत कर रहे थे।

बुधवार सुबह मंदिर परिसर से विधिवत पूजा-अर्चना के पश्चात भव्य कलश यात्रा एवं शोभायात्रा का शुभारंभ हुआ। पारंपरिक वेशभूषा में सुसज्जित महिलाओं ने सिर पर मंगल कलश धारण किए, जबकि समाज के पुरुष, युवा एवं बालक धर्मध्वजाओं के साथ शोभायात्रा में शामिल हुए। साफे व धोती कुर्ते में सजी बालिकाओं ने भी हाथों में तलवारें लेकर करतब दिखाए। श्रद्धालुओं ने जयघोष करते हुए नगर भ्रमण कर धर्म, संस्कृति एवं सामाजिक एकता का संदेश दिया। यात्रा के दौरान विभिन्न स्थानों पर श्रद्धालुओं ने पुष्पवर्षा कर स्वागत किया। मालियों की हवेली के बाहर विधायक श्रीमती शोभा चौहान की अगुवाई में भाजपा पदाधिकारियों एवं कार्यकर्ताओं ने पुष्प कर सभी का स्वागत किया।

भजन संध्या में प्रसिद्ध भजन गायक नरेश राव (भीलवाड़ा) एवं भजन गायिका ज्योति ने एक से बढ़कर एक भक्तिमय प्रस्तुतियां देकर उपस्थित श्रद्धालुओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। पूरा वातावरण भक्ति, श्रद्धा और उल्लास से सराबोर रहा तथा श्रद्धालु देर रात तक भजनों पर झूमते रहे।

जन्मोत्सव को लेकर समाज में विशेष उत्साह देखने को मिला। बड़ी संख्या में समाजबंधुओं एवं धर्मप्रेमियों ने दोनों आयोजनों में सहभागिता कर संत शिरोमणि लिखमीदासजी महाराज के प्रति अपनी श्रद्धा अर्पित की।

आयोजन समिति एवं माली समाज के चारों चौधरियों ने सभी समाजबंधुओं, भामाशाहों एवं सहयोगियों का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि समाज की एकता, संस्कृति और धार्मिक परंपराओं के संरक्षण के लिए ऐसे आयोजन निरंतर प्रेरणादायी सिद्ध होते हैं। समाजजनों ने अपने प्रतिष्ठानों एवं मजदूरी कार्यों से पूर्ण अवकाश रखा।









